NAGESHWAR-JYOTIRLINGA

Nageshwar Jyotirlinga नागेश्‍वर मंदिर का रहस्‍य:- नागेश्‍वर ज्‍योर्तिलिंग भगवान शंकर के 12 ज्‍योर्तिलिंगों में से एक है। रूद्र संहिता के अन्‍दर इन्‍हें दारूकावने नागेश नाम से प्रसिद्ध है। यह ज्‍योर्तिलिंग गुजरात राज्‍य के द्वारिकापुरी से 17 किलोमीटर बाहरी क्षेत्र में स्थित है।

नागेश्‍वर ज्‍योर्तिलिंग से संबंधित कथा।

प्राचीन मान्‍यता के अनुसार एक वैश्‍य था जिसका नाम सुप्रिय था जोकि बहुत बडा धर्मात्‍मा और सदाचारी था और भगवान शिव का अनन्‍य भक्‍त था और उनकी पूजा अर्चना में लगा रहता था। दारूक नामक राक्षस भगवान की पूजा करने वालों से नफरत करता था और इसलिये वह सुप्रिय से भी अप्रसन्‍न था और जब भी सुप्रिय पूजा अर्चना करता था तब वह उसकी पूजा में विघ्‍न डालता था।

सुप्रिय एक बार नौका से कहीं जा रहा था तभी दारूक ने अवसर पाकर उसकी नौका पर आक्रमण कर दिया तभी सभी को अपने साथ कैद करके ले गया और अपने करागार में डाल दिया। सुप्रिय ने वहां पर भी भगवान शंकर की पूजा अर्चना आरम्‍भ कर दी तथा अन्‍य वहां पर बंधित अन्‍य कदियों को भी भगवान की भक्ति करने के लिये प्रेरित करने लगा।

इस बात का समाचार जब दारूक राक्षस को पता चला तो उसे सुप्रिय पर बहुत क्रोध आया और वह करागार में आ गया और बोला तू यहां आंखे बंद करके मेरे खिलाफ षडयंत्र कर रहा है। दारूक राक्षस की बात का सुप्रिय पर कोई असर नहीं पड़ा और वह आंखे बंद करके भगवान शिव की भक्ति में तल्‍लीन रहा। राक्षस ने तत्‍काल अपने सेवकों को सुप्रिय व अन्‍य सभी बंदियों को मारने के लिये कहा। सुप्रिय इस आदेश से जरा भी नहीं डरा और अपनी अराधना में लगा रहा और भगवान शिव से सभी की रक्षा के लिये प्रार्थना करने लगा।

भगवान शिव हुए ज्‍योर्तिलिंग के रूप में प्रकट

जैसे ही वह लोग सुप्रिय व अन्‍य को मारने के लिये आगे बढे तभी भगवान शिव तत्‍काल कारागार के अन्‍दर एक ऊंचे स्‍थान पर सिंहासन पर ज्‍योर्तिलिंग के रूप में प्रकट हो गये। और सुप्रिय को पाशुपात नामक अस्‍त्र दिया जिससे सुप्रिय ने उससे दारूक राक्षस का वध किया तथा शिवधाम को चले गये। भगवान शंकर के निर्देशानुसार ही इस ज्‍योर्तिलिंग का नाम नागेश्‍वर ज्‍योर्तिलिंग पड़ा है।

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