ओंकारेश्‍वर ज्‍योर्तिलिंग

परमेश्‍वर ज्‍योर्तिलिंग, ओंकारेश्‍वर ज्‍योर्तिलिंग, ममलेश्‍वर ज्‍योर्तिलिंग:- भगवान शिव जी के 12 ज्‍योर्तिलिंगों में चतुर्थ स्‍थान पर ओमकारेश्‍वर ज्‍योर्तिलिंग आता है जो कि मध्‍य राज्‍य के अन्‍तर्गत आने वाले जिला खण्‍डवा के मन्‍धाता अथवा शिवपुरी नामक दीप पर स्थित है जो नर्मदा नदी के बीच में स्थित है। इसी ओमकारेश्‍वर ज्‍योर्तिलिंग को परमेश्‍वर, ममलेश्‍वर ज्‍या‍ेर्तिलिंग के नाम से भी जाना जाता है। इस ज्‍योर्तिलिंग के बारे में शिवपुराण की कोटि रूद्र सहिंता 18वें अध्‍याय में उल्‍लेख मिलता है। इस स्‍थान पर दो ज्‍योर्तिलिंग स्‍थापित हैं।

परमेश्‍वर ज्‍योर्तिलिंग, ओंकारेश्‍वर ज्‍योर्तिलिंग, ममलेश्‍वर ज्‍योर्तिलिंग से संबंधित कथा

पुराणिक मान्‍यता के अनुसार नारद जी एक बार घुमते-घुमते विध्‍यांचल पर्वत जा पहुंचे। जहां पर उनका स्‍वागत पर्वतराज विध्‍यांचल जी द्वारा किया गया। स्‍वागत करने के उपरान्‍त पर्वतराज नारद जी के सामने स्‍वयं अपनी प्रशंसा करने लगे कि वह सर्वगुण संपन्‍न है तथा उनके पास हर तरह की सम्‍पदा उपस्थित है।

नारद जी ने किया पर्वत विध्‍यांचल का अभिमान दूर

नाराद जी पर्वतराज की बाते सुनकर समझ गये कि पर्वराज विध्‍यांचल को अपने ऊपर अभिमान हो गया है इसलिये उनका अभिमान दूर करने के लिए नारद जी ने उनकी अभिमान भरी बातों के बीच में लम्‍बी सांस ली और चुपचाप खड़े हो गये। नारद जी को ऐसा करते देख विध्‍यांचल पर्वत राज ने नारद जी से पूछा कि मेरा पास ऐसा क्‍या नहीं है जिसके कारण तुमने लम्‍बी सांस ली तब मुनीवर नारद जी ने उत्‍तर दिया कि पर्वतराज आपके पास सब कुछ है परन्‍तु आप फिर भी सुमेरू पर्वत जितना ऊंचे नहीं है साथ ही सुमेरू पर्वत का भाग देवताओं के लोकों को भी स्‍पर्श करता है जोकि तुम्‍हारा पर्वत शिखर कभी नहीं कर सकता। इसके पश्‍चात नारद जी ने वहां से प्रस्‍थान किया। अब पर्वत जी को नारद जी की यह बात सुनकर अत्‍यन्‍त दुख हुआ। जब उन्‍होंने भगवान शिव की अराधना करने की सोची।

पर्वतराज विध्‍यांचल ने की शिवजी की अराधना

अब पर्वतराज जी ने इस समस्‍सा के निदान पाने के भगवान शिव के शिवलिंग की स्‍थापना कर उसकी अराधना करनी शुरू कर दी। 6 माह इसी तरह पूजा अर्चना में व्‍यतीत होने के पश्‍चात भगवान शिव उनकी पूजा से बहुत प्रसन्‍न हो उठे तथा उनको साक्षात दर्शन दिये और पर्वतराज से कहा मांगों क्‍या चाहते हूँ। तब पर्वत ने उत्‍तर दिय हे प्रभु यदि आप वास्‍तव में अपने इस भक्‍त से प्रसन्‍न है तो मुझे बुद्धि प्रदान करें जिसके बल पर मै जो चाहूं पर कार्य कर सकूं। भगवान शिव ने विध्‍यांचल को उनकी इच्‍छानुसार वरदान प्रदान कर दिया।

थोडी ही देर में वहां पर बहुत से ऋषि मुनि तथा देवी देवता आ गये और उन्‍होंने भगवान शिव से प्रार्थना की, कि वह सदा के लिये इसे स्‍थान पर ज्‍योति के रूप में निवास करें। जगत कल्‍याणकारी भगवान शिव ने सभी की बात मान ली तथा वहां पर सदा के लिए ज्‍योर्तिलिंग के रूप में निवास करने लगे। इस प्रकार यहां पर दो ज्‍योर्तिलिंग स्‍थापित हो गये एक जो विध्‍यांचल पर्वत द्वारा स्‍थापित किया गया और दूसरा भगवान शिव द्वारा बनाया गया।

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12 ज्‍योर्तिलिंगों के नाम

एक ही स्‍थान पर हुई दो ज्‍योर्तिलिंगों की स्‍थापना।

एक पार्थिव लिंग वह था जिसकी स्‍थापना पर्वतराज विध्‍यांचल द्वारा की गई जा‍ेकि परमेश्‍वर या अमलेश्‍वर ज्‍योर्तिलिंग कहलाया तथा दूसरा ज्‍योर्तिलिंग वह है जो ऋषि मुनि तथा देवी देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव ने वहां ज्‍योर्तिलिंग के रूप में निवास किया जोकि ओमकारेश्‍वर ज्‍या‍ेर्तिलिंग कहलाया इस तरह इस स्‍थान पर एक स्‍थान दो ज्‍योर्तिलिंग स्‍थापित हैं। जोकि सम्‍पूर्ण जगत में प्रसिद्ध हैं।

अन्‍य कहानी/ कथा के अनुसार

एक ही स्‍थान पर हुई दो ज्‍योर्तिलिंगों ओंकारेश्‍वर तथा परमेश्‍वर या अमलेश्‍वर की स्‍थापना।

प्राचीन मान्‍यता है कि यहां पर राजा मान्‍धाता द्वारा नर्मदा नदी के किनारे भगवान शिव की घोर तपस्‍या की थी। राजा मान्‍धाता की इसी तपस्‍या से प्रसन्‍न होकर भगवान शिव ने उनकों साक्षात दर्शन दिये और मान्‍धाता से वरदान मांगने के लिए कहा तब राजा ने भगवान शिव से यह वरदान मांगा की वह इसी स्‍थान पर ज्‍योर्तिलिंग के रूप में निवास करें। तभी से इस तीर्थ को ओंकार मान्‍धाता के रूप में जाना जाने लगा।

धनपति कुबेर से संबंधित कहानी

एक अन्‍य कहानी यह भी है कि यहां कुबेर जी जो कि शिव के अन्‍नय भक्‍त थे, ने यहां पर शिवलिंग की स्‍थापना की थी तथा पूजा अर्चना की थी। तथा शिवजी ने ही कुबेर को देवताओं का धनपति बनाया था। साथ ही भगवान शिव ने अपना जटा से कावेरी नदी का उत्‍पन्‍न की थी ताकि कुबेर जी उसमें स्‍नान कर सके। आज भी यह नदी श्री कुबेर जी के मंदिर से बहती हुए नर्मदा नदी में जाकर मिलती है। इसे ही नर्मदा कावेरी का संगम कहलाता है। इसलिए धनतेरस वाले दिन कुबेर जी के इस मंदिर में पूजा अर्चना करने के भक्‍तजनों का ताता लगा रहता है।

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